२० चैत्र २०८२, शुक्रबार April 3, 2026

राना थारू समुदायमे परम्परागत पहिरन लगैना चलन लोप हुइटी

१० चैत्र २०८२, मंगलवार
राना थारू समुदायमे परम्परागत पहिरन लगैना चलन लोप हुइटी

कञ्चनपुर, १० चैत । सुदूरपश्चिमके कैलाली ओ कञ्चनपुर जिल्लामे बसोबास करुइया राना थारू समुदायके महिलासे प्रयोग कैना परम्परागत गहना ओ पहिरन लगैना चलन घट्टी जाइ लागल बा ।
आधुनिक गहना, बजारमे पाजैना कपडा ओ जीवनशैलीमे आइल परिवर्तनके कारण परम्परागत पहिरन ओ गहनाके प्रयोग घट्टी गैल हो । शुक्लाफाँटा नगरपालिका–१२ कालागौँडीके ६० वर्षीया सोमती रानाके अनुसार पहिले महिलाहुक्रे घरमे हाठसे सियल घघँरिया, अँगिया, फतुई, उढनिया लगायतके पहिरन लगैना करिट । उ बेला महिला शिरसे पाउसम चाँदीके गहनासे सजना चलन रहे ।
कपालमे चाँदीके चाँपी, कानमे वीर, नक्बेसर, नाकमे नथुनी, घाँटीमे चाँदीके पैसासे बेरल करिया धागा, ओम्ने टरे कठुला, हसुला ओ सकरगरेला लगैना चलन रहल उहाँ बटैली । “पखुरीमे लगौरा, नाडीमे पहुँची, अंगरीमे कलात्मक औँठी, कम्मरमे सिक्री रहल कैँधनी, पैतलाउपर ढुन्नी, ओकर टरे पैँडा ओ पायल लगैना करिट” उहाँ कहली, “घाँटीमे कण्ठ, गरिया ओ घिच्ची लगैना प्रचलन फेन रहल रहे ।”
परम्परागत पहिरन ओ गहना लगाइल महिलाहे पहिले समाजमे सम्मानके साथ हेर्ना करिट । “कपारमे ओह्रनिया, गलामे हार ओ कण्ठसिरीमाला, छातीमे फतुई, कम्मरमे घघँरिया ओ गोरम पैँडा लगाइल महिलाहे सभ्य, संस्कारयुक्त ओ प्रतिष्ठित महिलाके रूपमे लेना करजाए,” चन्द्रमती राना कहली ।
“अब्बे परम्परागत गहना कम महिलासँग किल बाँकी बावै” उहाँ कहली, “ढेर महिला आधुनिक डिजाइनके सुन तथा कृत्रिम गहना प्रयोग करे लागलपाछे पुरान गहनाके प्रयोग घट्टी गैल बा, परम्परागत गहना बनैना सीप रहल कारीगर फेन अब्बे पैना मुस्किल हुइल ओरसे परम्परागत गहना हेरैटी गैल बावै ।”
फुलमती रानाके अनुसार पहिले पुरुष ओ महिलाके पहिरन स्पष्ट रूपमे परम्परागत रहे । अब्बे पुरुष पुरान पहिरन लगाइ छोरसेकल बटै कलेसे महिलाके पहिरनमे फेन आधुनिकताके प्रभाव डेख परे लागल बा । परम्परागत पहिरन बचैना प्रयास रलेसे फेन पहिले जैसिन पूर्ण रूपमे परम्परागत पहिरन लगैना चलन भर घट्टी गैल उहाँ बटैली ।
“राना थारू समुदायमे प्रयोग हुइना ढेर गहना चाँदीके रहना करे” उहाँ कहली, “उ गहना केवल सौन्दर्यके लाग किल नैहोके सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक अवस्था ओ सांस्कृतिक पहिचानसँग फेन जोरल रहे, भोज, टरटिहार, पूजा, नाचगान तथा विशेष अवसरमे महिला अनिवार्य रूपमे उ गहना ओ परम्परागत पहिरन लगैना करिट ।”
ओहकान अनुसार पहिले घरमे कपडा ओ धागा तयार कैके पहिरन बनैना चलन रहे । महिलाहुक्रे अपनहे पहिरन तयार कैना करिट । अब्बे बजारमे पाजैना कपडा प्रयोग करे लागलपाछे घरमे कपडा तयार कैना परम्परा फेन हेरैटी गैल बा । यकरसँगे परम्परागत पहिरन फेन ढिरेसे हेरैटी गैल स्थानीय बुढापाकाके कहाइ रहल बा ।
परम्परागत गहना बनुइया कालिगढके संख्या घट्ना फेन औरे कारण रहल बटाइल बा । “पहिले गाउँमे गहना बनुइया सुनचाँदीके कारीगर रहिट, अब्बे ओइसीन कालिगढ पैना कर्रा रहल बा” रानाथारु अगुवा रामशाह राना कहलै, “लावा पुस्ता परम्परागत गहना बनाइ सिखे नैचाहेबर इ सीप फेन लोप हुइना अवस्थामे पुगल बा ।” ओहकान अनुसार परम्परागत गहना ओ पहिरन केवल कपडा वा आभूषण किल नैहोके राना थारू समुदायके इतिहास, संस्कृति, पहिचान ओ जीवनशैलीसँग जोरल सम्पदा हो । ओहेमारे यकर संरक्षण आवश्यक रहल उहाँ बटैलै ।
अब्बे कुछ स्थानमे सांस्कृतिक कार्यक्रम, भोज ओ विशेष अवसरमे किल परम्परागत पहिरन लगैना करजाइठ्, कलेसे दैनिक जीवनमे आधुनिक पहिरन प्रयोग हुइना करल बा । इहीसे लावा पुस्तासे पुरान पहिरन ओ गहनाके नाउँ समेत नैजैन्ना अवस्था आइ लागल प्रति उहाँ चिन्ता प्रकट करलै । परम्परागत गहना ओ पहिरनके संरक्षणके लाग स्थानीय तह, समुदाय ओ सरोकारवाला निकाय पहल कैना आवश्यक रहल बा । परम्परागत गहना बनुइया कालिगढहे प्रोत्साहन, सीप हस्तान्तरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजना तथा सङ्ग्रहालय स्थापना जैसिन कार्य करे सेक्लेसे परम्परागत पहिरन ओ गहना बचाइ सेकजैना शुक्लाफाँटा नगरपालिका १२ के वडाध्यक्ष नवलसिंह राना बटैलै ।
“राना थारू समुदायके परम्परागत गहना ओ पहिरन केवल सौन्दर्यके साधन किल नैहोके सांस्कृतिक पहिचानके महत्वपूर्ण प्रतीकके रुपमे रहल बावै” उहाँ कहलै, “यकर संरक्षण ओ पुस्तान्तरण आजके आवश्यकता हो, समयमे संरक्षण करे नैसेक्लेसे भर राना थारू समुदायके परम्परागत गहना ओ पहिरन इतिहासके पानामे किल सीमित हुइना खतरा बह्रटी गैल बा ।”